मगर ब्रिटेन के अख़बार टाइम्ज़ ने अमरीका के मामलों के विशेषज्ञ डेविड रिचर्ड का लेख प्रकाशित किया है जिसमें लेखक का कहना है कि बेशक किताब से ट्रम्प की परेशानी तो बढ़ेगी लेकिन उनके वोट शेयर को नुक़सान नहीं पहुंचेगा।
जब 1974 में वाटरगेट का मुद्दा गरमाया हुआ था तो उस समय राष्ट्रपति रिचर्ड निकसन को दस्तावेज़ जारी करना पड़ा था। इससे पता चला था कि निकसन ने अपने स्कैंडल को छिपाने के लिए किस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को इस्तेमाल किया था।
ट्रम्प इससे पहले यूक्रेन के मामले में महाभियोग से बच गए थे और अब वह राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को इस्तेमाल कर रहे हैं।
ट्रम्प इस समय जान बोल्टन की किताब का प्रकाशन रुकवाने के लिए क़ानून की मदद ले रहे हैं जबकि इस किताब की चीजें अमरीका और दुनिया की मीडिया में फैल चुकी हैं। बोल्टन की नीयत के बारे में संदेह होना स्वभाविक है। निकसन की साख तो उस समय सामने आने वाली कैसेट्स ने ध्वस्त कर दी थी मगर इस समय यह नहीं लगता कि बोल्टन की किताब वही काम ट्रम्प के साथ करेगी।
यह देखना होगा कि फ़्लोरीडा, ओहायो, पेन्सेलवानिया और विस्कांसन जैसे राज्यों में मतदाताओं को किस सीमा तक बोल्टन की किताब सोच बदलने पर तैयार कर सकती है। मतदाताओं को विदेश नीति के मंच पर जारी मतभेदों और विवादों से कोई मतलब नहीं होता कि ट्रम्प ने चीन के राष्ट्रपति से मदद मांगी थी या नहीं। मतदाताओं को तो यह नज़र आता है कि ट्रम्प ने चीन से मांग की थी कि वह अमरीका के कृषि उत्पादों की ख़रीदारी बढ़ाए। बोल्टन को लगेगा कि ट्रम्प ने अपने व्यक्तिगत फ़ायदे के लिए यह क़दम उठाया होगा मगर अमरीकी किसान की सोच अलग होगी।
जो बाइडन को भी बोल्टन जैसे व्यक्ति की किताब से उम्मीद नहीं लगानी चाहिए कि व्यापारी और कामगार तबक़ा उनकी किताब से प्रभावित होकर ट्रम्प को छोड़ देगा।
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